Boonex dolphin remove dating

I have a server with a dolphin boonex sofware installed, 7.1.4 version (boonex.com).However, I don't think the boonex fact is part of the problem.There are quite a few modules that offer extensive enhancements for any site.कई मनोचिकित्सकों का मानना है कि अगर ज्यादा समय तक हस्तमैथुन न किया जाए तो वह हानिकारक नहीं होता है। अधिक मात्रा में हस्तमैथुन करने से शरीर के अंदर कई प्रकार के रोग पैदा हो जाते हैं जैसे- चेहरे की चमक समाप्त हो जाना,आंखों के नीचे काले गड्डे पड़ जाना, शरीर के विकास का रुक जाना, कमर के अंदर हमेशा दर्द बने रहना, शरीर की कमजोरी, कुछ भी खाने-पीने का मन न करना तथा किसी भी कार्य को करने में जी न लगना आदि लक्षण महसूस होने लगते हैं। कभी-कभी तो हस्तमैथुन करने के कारणटेढा हो जाता है। लेकिन सेक्स के ज्ञाताओं का कहना है कि हस्तमैथुन करने से लिंग के आकार में किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं आता है क्योंकि लिंग ऊतकों से बना हुआ होता है। लिंग के अंदर किसी प्रकार की कोई हड्डी नहीं होती है। इसकी बनावट स्पंज के जैसी ही होती है। इसलिए लिंग सामान्य अवस्था में लटका हुआ तथा मुलायम होता है। लिंग के अंदर जब तनाव पैदा होता है तो वह बहुत अधिक सख्त हो जाता है और इसकी वजह से वह एक तरफ झुक जाता है। लिंग की इस अवस्था को देखकर अधिकतर लोग अपने मन में लिंग के टेढ़ा होने का भ्रम पैदा कर लेते हैं। लिंग के अंदर तनाव पैदा हो जाने के समय में लिंग की नसों में खून भर जाने से लिंग का एक तरफ झुक जाना यह एक आम बात है। तनाव की अवस्था में भी किसी पुरुष का लिंग ठीक स्थिति में खड़ा नहीं हो सकता है। कई पुरुष हस्तमैथुन करते समय अंतिम समय पर पहुचने पर अपने लिंग को हाथ से दबाकर लिंग के आगे के मुख को बंद कर लेते हैं ताकि उनका वीर्य बाहर न निकल पाए। इस तरह से करने से वे लोग ये सोचते हैं कि वे हस्तमैथुन करने से आनंद भी उठा लें और उनके शरीर के अंदर वीर्य भी नष्ट न हो लेकिन इस तरह से करना किसी भी तरह से ठीक नहीं है, क्योंकि इससे शरीर को नुकसान होता है। हस्तमैथुन करने के बाद वीर्य का बाहर निकलना एक स्वाभाविक क्रिया है क्योंकि जब वीर्य अपनी जगह से निकलेगा तो वह पुनः अपनी जगह पर नहीं आएगा। अगर हस्तमैथुन करने के बाद वीर्य को बाहर निकलने से रोका जाए तो वीर्य मूत्र थैली के अंदर चला जाता है और बाद में मूत्र के साथ बाहर निकल जाता है। इसलिए लिंग पर किसी भी तरह का कोई दबाव देकर वीर्य का रोकना सही नहीं है। अधिक दबाव डालने के कारण लिंग को नुकसान पहुंच सकता है और वीर्य के कारण कई बार मूत्र नली भी बंद हो जाती है। कुछ पुरुष अधिक उत्तेजना में भर जाने से लिंग को पलंग पर तथा तकिये पर रगड़ने लगते हैं। कई बार तो पुरुष किसी वस्तु को लेकर छेद बना लेते हैं या किसी खाली बोतल के अंदर लिंग को डालकर जोर-जोर से घर्षण करने लगते हैं। कुछ पुरुष तो जमीन के अंदर मिट्टी में गड्डा बनाकर घर्षण करने लगते हैं। इस तरह की क्रिया को कदापि नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से लिंग को हानि हो सकती है। कई बार सख्त चीज की रगड़ लगने से लिंग पर चोट भी लग जाती है या फिरभी आ जाती है या लिंग के आगे के भाग की त्वचा पीछे की तरफ खिंचकर फट भी सकती है। इसलिए हस्तमैथुन करने के ऐसे गलत तरीकों से बचना चाहिए। हस्तमैथुन करने की आदत अधिकतर कुंवारे युवकों में ही देखी जाती है। उन युवकों को हस्तमैथुन करने की जरुरत नहीं होती है जो शादी हो जाने के बाद अपनी स्त्री के साथ संभोग क्रिया करते हैं। लेकिन कई बार कुछ युवक या पुरुष अपनी पत्नी के मायके चले जाने के बाद अपने आप हस्तमैथुन कर के अपनी कामेच्छा को पूर्ण रूप दे देते हैं। तथा कई बार पुरुष अपनी पत्नी के साथ संभोग करने से पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं हो पाते हैं इसलिए वह हस्तमैथुन करके अपने आपको संतुष्ट कर लेते हैं। किसी भी व्यक्ति पर अच्छी बातों का असर बहुत ही देरी से होता है लेकिन बुरी आदतों का असर शीघ्र ही हो जाता है। किशोरावस्था के अंदर युवक का मन और भावनाएं बहुत ही नाजुक होती है। स्कूल जाते समय तथा सड़को पर चलने-फिरने वाली सुंदर और दिल को भाने वाली लड़कियों को देखकर उनके अंदर सेक्स करने की शक्ति जागने लगती है तथा उनके शरीर के अंदर धीरे-धीरे उत्तेजना आने लगती है। स्कूल-कालेजों के अंदर अपने से ज्यादा अनुभवी युवाओं की संगति में रहकर वह ज्यादा उत्तेजित पुस्तके, सेक्स और उस के बारे में बाते करना लगते हैं। इसके बाद सेक्स से जुड़ी हुई गलत आदतों का शिकार होकर हस्तमैथुन करने लग जाते हैं। बार-बार हस्तमैथुन करने से उसे कुछ देर के लिए आनंद मिल जाता है। हस्तमैथुन करने से एक स्वस्थ पुरुष भी अपने-आपको रोगी महसूस करने लगता है। जो पुरुष बुरे दोस्तों के साथ रहने के कारण हस्तमैथुन के रोगी बन जाते हैं उन्हें उन दोस्तों का साथ खुद ही छोड़ देना चाहिए। अगर घर का माहौल सही होता है तो बच्चे के अंदर भी अच्छी आदतें पैदा होती है। इसके अलावा अगर घर के सदस्य गंदी बातें करेंगे तो बच्चे भी गंदी आदतों का शिकार हो जाएंगे। जब कोई लड़का किशोरवस्था में पहुंचता है तो उस के मन में सेक्स के बारे में जानने की इच्छा जागृत होती है। वह अपने भाई-भाभी के सेक्स करने के तथा मां-बाप के चुम्बन करने पर बहुत ही बारिकी से ध्यान रखता है, अगर घर के लोग एंकात और शर्म के बारे में सोचे तो जवान होते बालक पर इस बात का कोई असर नहीं होता, इस तरह से उसके अंदर सेक्स करने की भावना जागृत नहीं होती। लेकिन घर के अंदर इस तरह के कार्य को करते हुए देखकर उसके मन में इस तरह की इच्छा पैदा हो जाती है और वह इस तनाव से मुक्ति पाने के लिए अपने हाथ को लिंग पर रख देता है। लिंग पर हाथ रखने के बाद उसको सहलाने से उसको बहुत अधिक मजा आने लगता है, जिसके वाद वह वीर्य को बाहर निकाल देता है। घर के अंदर इस तरह के वातावरण से जवान होते लड़कों पर बहुत ही गलत असर पड़ता है। कई बार तो लड़के रात के समय छुप-छुपकर अपने भाई-भाभी तथा मां-बाप को सेक्स क्रिया करते हुए देख लेते हैं। इस तरह से देखने के बाद उन के मन में भी इस तरह के कार्य करने का मन करता है, लेकिन कोई साधन न होने की वजह से वे हस्तमैथुन करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इस तरह से एक बार आनंद आने के बाद वे बार-बार हस्तमैथुन करके अपने आपको तसल्ली दे देते हैं होने लगती है। लिंग पर खुजली होने की वजह से लिंग के अंदर तनाव पैदा हो जाता है, जिसके कारण लिंग को सहलाने और खुजलाने की वजह से एक अजीब सा आनंद महसूस होता है। लिंग पर बार-बार हाथ लगने की वजह से लिंग सख्त हो जाता है और इसके अंदर तनाव आ जाता है। तब युवक थोड़े समय के आनंद के लिए अपने वीर्य को हस्तमैथुन करके बाहर निकाल देता है। थोड़े समय के आनंद के लिए वह बार-बार इस क्रिया को करता रहता है। इस तरह से करते रहने से उसकी यह आदत हस्तमैथुन का रूप धारण कर लेती है। इसलिए मां-बाप को बचपन से ही चाहिए कि बच्चे के लिंग के आगे के भाग की त्वचा को अच्छी तरह से खोलकर उसकी सफाई करने की आदत बच्चों में डाल दें। अगर इस तरह का कार्य बचपन से ही मां कर दें तो बच्चे को किसी भी तरह का कोई भी डर नहीं रहता है। कई बार लिंग में किसी अन्य रोग के हो जाने की वजह से एक हलचल सी होने लगती है, जिसके कारण किशोर अपने लिंग को हाथ के द्वारा रगड़ने लग जाता है। इस तरह की क्रिया करने से लिंग के अंदर सख्तपन और अधिक तनाव आ जाता है। इस प्रकार करते रहने से हस्तमैथुन की आदत पड़ जाती है। किशोरावस्था के अंदर गंदी किताबों और अश्लील पिक्चरों को देखने से भी युवक को हस्तमैथुन की आदत पड़ जाती है। इस तरह की किताबों और फिल्मों को देखकर जब युवक के शरीर के अंदर सेक्स करने की इच्छा जगने लगती है तो उसे समान रूप से संभोग के द्वारा इसको समाप्त कर देना इतना आसान नहीं होता है। इसके विपरीत शरीर के अंदर तेज होती वासना को समाप्त करने के लिए हस्तमैथुन का सहारा लिया जाता है। इस प्रकार यह कार्य करने से यह एक आदत सी बन जाती है और युवक इस कार्य को बार-बार करने के लिए मजबूर हो जाता है। से होता है। कई बार युवक का हाथ अनजाने में ही लिंग पर चला जाता है जिसके उसके अंदर उत्तेजना जागृत हो जाती है, उसे यह बहुत ही अच्छा लगता है। इस तरह से करने के बाद वह अपने लिंग को हाथ में लेकर आराम-आराम से सहलाने लगता है और वीर्य के निकलने तक वह इस क्रिया को करने के लिए अति उत्सुक रहता है। कई पुरुषों का यह सोचना है कि क्या स्त्रियां भी हस्तमैथुन करने में रुचि लेती है, तो इसका जवाब यह है कि आज के युग में स्त्रियां भी हस्तमैथुन करती है। यह बात बिल्कुल ठीक है। जब बालिका की उम्र 12 से 13 साल के आस-पास हो जाती है तो उनके शरीर के अंगों का तेजी से विकास होने लगता है उस समय वह अपनी योनि के अग्र भाग को मसलकर इस तरह के कार्य को करने लग जाती है। स्त्रियों के शरीर के अंदर उनको उत्तेजित करने वाला सबसे नाजुक भाग योनि का ही होता है। जिस तरह से लड़को को हस्तमैथुन करने से सुख की प्राप्ति होती है उसी प्रकार लड़कियों को भी अपनी योनि के अग्र भाग को रगड़ने से सेक्स क्रिया करने का आनंद प्राप्त होता है। अधिकतर वे स्त्रियां जो किसी वजह से पुरुष के साथ सेक्स क्रिया नहीं कर पाती है वे इस तरह का कार्य करके अपनी सेक्स वासना को संतुष्ट कर लेती है। अधिकतर यह देखा गया है कि कभी-कभी लड़किया कोई एकांत सी जगह देखकर मोमबत्ती, इस तरह के कोई रोग हो तो उनको समाप्त करने के लिए सप्ताह के अंदर एक या दो बार सेक्स क्रिया जरुरी होता है। अगर सेक्स क्रिया करने का कोई साधन ना हो तो शरीर तथा मन के अंदर उठी हुई कामवासना को समाप्त करने के लिए सप्ताह में एक या दो बार हस्तमैथुन कर सकते हैं। " data-medium-file="" data-large-file="" class="size-full wp-image-1362 aligncenter" src="https://i0com/जारी करता है और दूध को बढ़ाता है। शहद हल्का होता है, पेट मे शहद जाते ही तुरंत पचकर खून में मिल जाता है और शरीर में ताकत का संचय (जोड़) देता है। शहद को जिस चीज के साथ लिया जाये उसी तरह के असर शहद में दिखाई देते है। जैसे गर्म चीज के साथ लें तो- गर्म प्रभाव और ठंडी चीज के साथ लेने से ठंडा असर दिखाई देता है। शहद से शक्कर निकाला जाता है। शहद में शक्कर के दाने देखकर उसकी विशुद्धता पर संदेह नहीं करना चाहिए। शहद पर देश, काल स्थान का असर पड़ता हैं। इनके रूप, रंग, स्वाद में अंतर होता है। शहद में पोटैशियम होता है, जो रोग के कीटाणुओं का नाश करता है। कीटाणुओं से होने वाले रोग- जैसेआंतरिक बुखार(टायफायड) ब्रान्कोनिमानियां आदि अनेक रोगों के कीटाणु शहद से खत्म हो जाते हैं। यदि किसी मनुष्य की त्वचा पीली है, तो इसका कारण होता है खून में आयरन की कमी होना। शहद में लौह तत्त्व अधिक होता है। सुबह-शाम भोजनोपरान्त (भोजन के बाद) नींबू के रस में शहद मिलाकर अथवा दूध में शहद मिलाकर सेवन करना लाभकारी होता है। शहद में 50 प्रतिशत ग्लूकोज, फ्रक्टोज 37 प्रतिशत, सुक्रोज 20 प्रतिशत, माल्टोज बीस प्रतिशत और इतना ही डेक्सट्रिन्स, गोंद, मोंम क्लोरोफील और सुगन्ध के अंश होते हैं।शहद गाढ़ा, चिपचिपा, हल्के भूरे रंग का, अर्द्ध पारदर्शक, सुगन्धित, मीठा तरल पदार्थ है। यह मधुमक्खियों द्वारा प्राकृतिक रूप से तैयार किया जाता है। इसमें पानी तथा शक्कर होता है किन्तु यह चीनी बाजार में मिलने वाली कृत्रिम शक्कर जैसी नहीं बल्कि फल एवं फूलों की शर्करा होती है जो मधुमक्खियों द्वारा बड़े परिश्रम से एकत्रित किया जाता है। शहद पैदा करनें वाली मधुमक्खियों के भेद के अनुसार वनस्पतियों की विविधता के कारण शहद के गुण, स्वाद और रंग में अंतर पड़ता है। शहद पर प्रदेश, व काल का भी असर पड़ता है। जैसे- हर्र, नीम तथा अन्य वृक्षों पर बने हुए शहद के छत्ते के शहद सम्बन्धित वृक्षों के गुण आते हैं। जिस समय शहद एकत्रित किया जाता है उस समय का असर भी शहद पर पड़ता है। शीतकाल या बसंतऋतु में विकसित वनस्पति के रस में से बना हुआ शहद उत्तम होता है और गरमी या बरसात में एकत्रित किया हुआ शहद इतना अच्छा नही होता है। गांव या नगर में मुहल्लों में बने हुए शहद के छत्तों की तुलना में वनों में बनें हुए छत्तों का शहद अधिक उत्तम माना जाता है। कृतिया शहद। जिस शहद की मक्खियों को उड़ाने की कोशिश करने पर वे चिढ़ कर डंक मारती हो वह `मक्खिया शहद´ कहलाता है। जिस छते पर पत्थर फेंकने पर मक्खियां उड़कर डंक नही मारती उसे `कृतिया शहद´ कहते हैं। दोनों तरह के शहद के गुणों और स्वाद में भी थोड़ा-सा अंतर होता है। कृतिया शहद की मक्खियां बहुत छोटी होती हैं और वे यथाशक्ति पेड़ के पोले(खाली जगह) हिस्से में शहद का छत्ता बनाती है। भौरों की मादाओं के शहद की तुलना मक्खियों का शहद उत्तम माना जाता है। शहद के छतों में से वर्ष में दो बार शहद लेने का उचित समय एक चैत-बैसाख और दुसरा कार्तिक मास के शुक्लपक्ष में हैं। बरसात के मौसम शीतल होने के कारण शहद पतला और खट्टा होता है। शहद में मौजूद लौह आदि क्षार रक्त को प्रतिअम्ल बनाते हैं। वह खून के लाल कणों को बढ़ाता है। शहद शरीर को गर्मी व ताकत प्रदान करता है। शहद का खट्टापन श्वास, खांसी, हिचकी आदि श्वसनतंत्र सम्बन्धी रोगों में लाभदायक होता है। गरम चीजों के साथ शहद का सेवन नहीं करना चाहिए। शहद सेवन करने के बाद गरम पानी भी नहीं पीना चाहिए। गरमी से पीड़ित व्यक्ति को गरम ऋतु में दिया हुआ शहद जहर की तरह कार्य करता है। शहद गर्मियों में प्राप्त किया जाता है। शहद में 42 प्रतिशत शर्करा, 35 प्रतिशत द्राक्षशर्करा होती है। बाकी ग्लूकोज की मात्रा होती है। ग्लूकोज खून में जल्दी ही मिलकर पच जाता है। उसे पचाने के लिए शरीर के अन्य अवयवों को मेहनत करनी नहीं पड़ती। शहद की शर्करा पचने में ज्यादा हल्की, जलन पैदा करने वाली, उत्तेजक, पोषक, बलदायक है। इसलिए जठराग्नि की मंदता, बुखार, वमन, तृषा, मधुमेह, अम्लपित्त, जहर, थकावट, हृदय की कमजोरी आदि में शहद ज्यादा ही लाभदायक सिद्ध होता है। मधुशर्करा में सोमल, एन्टिमनी, क्लोरोफोर्म, कार्बनटेट्राक्लोराइड, आदि जहरीले द्रव्यों का असर खत्म करने की शक्ति भी होती है। शहद की अम्लता में सेब का मौलिक एसिड और संतरे में साइट्रिक एसिड होता है। यह अम्लता जठर को उत्तेजित करती है और पाचन में सहायक बनती है। शहद की अम्लता और एन्जाइम के कारण आंतों की आकुन्चन गति से वेग मिलता है। आंतों की कैपीसिटी (क्षमता) बढ़ती है, मल चिकना बनता है और आसानी से बाहर निकलता है। शहद मात्रा से ज्यादा नहीं खाना चाहिए। बच्चे बीस से पच्चीस ग्राम और बड़े चालीस से पचास ग्राम से अधिक शहद एक बार में न सेवन करें। लम्बे समय तक अधिक मात्रा में शहद का सेवन न करें। चढ़ते हुएयदि शहद से कोई हानि हो तो नींबू का सेवन करें। ऐसी स्थिति में नीबू का सेवन करना रोगों को दूर कर लाभ पहुंचाता है। शहद को दूध, पानी, दही, मलाई, चाय, टोस्ट, रोटी, सब्जी, फलों का रस, नींबू आदि किसी भी वस्तु में मिलाकर खा सकते हैं। सर्दियों में गर्म पेय के साथ गर्मियों में ठंडे पेय के साथ तथा वर्षा ऋतु में प्राकृतिक रूप में ही सेवन करना चाहिए। शहद को अग्नि (आग) पर कभी गरम नही करना चाहिए और न ही अधिक गर्म चीजें शहद में मिलानी चाहिए इससे शहद के गुण समाप्त हो जाते हैं। इसको हल्के गरम दूध या पानी में ही मिला कर सेवन करना चाहिए। तेल, घी, चिकने पदार्थ के साथ सममात्रा (समान मात्रा) में शहद मिलाने से जहर बन जाता है। कुछ बच्चे रात में सोते समय बिस्तर में ही मूत्र (पेशाब) कर देते हैं। यह एक बीमारी होती है। सोने से पहले रात में शहद का सेवन कराते रहने से बच्चों का निद्रावस्था में मूत्र (पेशाब) निकल जाने का रोग दूर हो जाता है। सबसे पहले रोगी की कब्ज को दूर करना चाहिए। इसके लिए एरण्ड का तेल पिलाया जा सकता है। इसके बाद चिकित्सा आरम्भ शुरू करनी चाहिए। चिकित्सा के लिए शहद में लौंग के तेल की एक बूंद तथा अदरक के रस की दस बूंदे मिलाकर सुबह, दोपहर और शाम को देनी चाहिए। नीलाथोथा लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग को भुन पीसकर 10 ग्राम शहद में मिलालें। इस मिश्रण को रूई से छालों पर लगायें तथा लार बाहर निकलने दें। मुंह की गंदगी लार के रूप में मुंह से बाहर निकाल कर छालों को ठीक करती है। गर्भावस्था में महिलाओं के शरीर में रक्त की कमी आ जाती है। गर्भावस्था के समय रक्त बढ़ाने वाली चीजों का अधिक सेवन करना चाहिए। महिलाओं को दो चम्मच शहद प्रतिदिन सेवन करने से रक्त की कमी नहीं होती है। इससे शारीरिक शक्ति बढ़ती है और बच्चा मोटा और ताजा होता है। गर्भवती महिला को गर्भधारण के शुरू से ही या अंतिम तीन महीनों में दूध और शहद पिलाने से बच्चा स्वस्थ और मोटा ताजा होता है। शहद हृदय को शक्ति देने के लिए विश्व की समस्त औषधियों से सर्वोत्तम हैं इससे हृदय इतना शक्तिशाली हो जाता है जैसे घोड़ा हरे जौ खाकर शक्ति प्राप्त करता है। शहद के प्रयोग से हृदय के पुट्टों की सूजन दूर हो जाती है। जहां यह रोग-ग्रस्त हृदय को शक्ति देता है वहां स्वस्थ हृदय को पुष्ट और शक्तिशाली बनाता है, हृदय फेल होने से बचाता है। जब रक्त में ग्लाइकोजन के अभाव से रोगी को बेहोश होने का डर हो तो शहद खिलाकर रोगी को बेहोश होने से बचाया जा सकता हैं शहद मिनटों में रोगी में शक्ति व उत्तेजना पैदा करता हैं। सर्दी या कमजोरी के कारण जब हृदय की धड़कन अधिक हो जाये, दम घुटने लगे तो दो चम्मच शहद सेवन करने से नवीन शक्ति मिलती है। हृदय की दुर्बलता, दिल बैठना आदि कोई कष्ट हो तो शहद की एक चम्मच पानी में डालकर पिलायें। एक चम्मच शहद प्रतिदिन लेने से हृदय सबल व मजबूत बनता है। ग्राम सिरस के बीजों के चूर्ण को कपड़े में छानकर उसमें 20 ग्राम शहद मिलाकर किसी कांच के बर्तन में डालकर 15 दिन के लिये धूप में रख दें। 15 दिन के बाद चूर्ण को रोजाना सुबह 5 से 10 ग्राम तक खायें और ऊपर से मिश्री मिला हुआ दूध पी लें। इससे कण्ठमाला (गले की गांठों) में आराम आता है। 5 से 10 मिलीलीटर भट्कटैया के फलों के रस को शहद के साथ सेवन करने से गलकोष प्रदाह (गले की जलन) में आराम आता है। " data-medium-file="" data-large-file="" class="aligncenter size-full wp-image-1366" src="https://i0com/

When trying to post links to external content the post will ... After upgrading the PHP version I am experiencing a problem in my site that is it throws PHP Strict Standards errors. I've a dating site developed with Boonex Dolphin and I want to disallow all contact with members who are the same sex.I had to Google each of these to find out what they did (well, the spy module anyway).It would be more helpful if there was a popup description for each module that accurately describes what it does and how to go about using it / finding it on the site once activated.I checked the help link in the back end of the installation and that simply brought me to their wiki.In the administration guide, I could not find anything on any of these modules, which I found odd considering they are there with the default install.Boonex Dolphin is available in a number of licenses.

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